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:- चकिया पूर्वी चम्पारण से अमितेश कुमार रवि की रिपोर्ट

चकिया ,पूर्वी चम्पारण। बच्चें को शिक्षा देने का कार्य शिक्षक का है तो शिक्षा निर्धारण सिर्फ राजा के द्वारा कैसे संभव है इसमें सिर्फ आइपीएस, आईएस अफसरों अधिकारियों को ही नहीं रखना चाहिए । नए शिक्षा नीति में साहित्यकार भाषाविद् , शिक्षाविद् एवं अध्यापकों के द्वारा शिक्षा नियमावली को बनाना चाहिए सहयोग के लिए आइएस , आइपीएस को देना चाहिए। 

आज भी भारत में मैकाले की शिक्षा नीति चलती है । इसे बदल कर राष्ट्रीय शिक्षा नीति में संस्कृत के साथ भारतीय संस्कृति को शिक्षा में विशेष महत्व देना चाहिए   । इससे प्राचीन धरोहर एवं ज्ञान विज्ञान का विकास होगा । अंग्रेजी भाषा है इसे भाषा के रुप में ही रखना चाहिए अंग्रेजियत को शिक्षा से दूर रखना चाहिए । कृष्णयजुर्वेद के तैत्तिरीय उपनिषद् के शिक्षा वल्ली में पहले से ही शिक्षा का महत्व शिक्षा के साथ चरित्र निर्माण बताया गया है इसे शिक्षा नीति में लागू करना चाहिए । वर्तमान शिक्षा के ह्रास्य का मुख्य कारण है कि शिक्षा मंत्रालय एवं संस्कृति मंत्रालय का अलग - अलग होना है । शिक्षा मंत्रालय एवं संस्कृति मंत्रालय को एक करना चाहिए , तभी  भारतीय का विकास संभव है ।

विदेशी शिक्षा हमें बाजार के रुप में दिखाता है मगर प्राचीन ऋषि महर्षि द्वारा प्रदत्त वैदिक शिक्षा हमें वसुधैव कुटुंबकम् का राह दिखाता है । किसी देश को आगे बढ़ाना है तो स्वकीय शिक्षा पर ध्यान देना होगा ।

उक्त बातें आर्षविद्या शिक्षण प्रशिक्षण सेवा संस्थान , मोतिहारी के पूर्व वेदाध्यायी अभिषेक कुमार दूबे ने 

 राष्ट्रीय शिक्षा नीति २०१९ पर चर्चा में सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी में कहां ।


Posted by

Raushan Pratyek Media


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