- शिविर में 84 लोगों की हुई जांच

-गर्भवती महिलाओं में एड्स की की गई जांच

-संदिग्ध टीबी मरीजों की पहचान के लिए की गई जांच

- जागरुकता ही एड्स से बचाव

किशोर कुमार की रिपोर्ट

मधुबनी :-जिले के रहिका प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की ओर से रहिका प्रखंड के पोखरौनी में कैंप लगाकर यक्ष्मा टीबी, कालाजार मरीज, एवं  उच्च जोखिम वाले विशेषकर गर्भवती महिलाओं एचआईवी जांच एवं परामर्श से वंचित के लिए एक दिवसीय शिविर का आयोजन किया गया। शिविर में आने वाले 84 लोगों  की जांच की गई. जांच के बाद उन्हें जिस तरह की बीमारी निकलती है, उसकी चिन्हित रोग की दवा दी गई. अगर ज्यादा गंभीर बीमारी सामने आती है तो उसे इलाज के लिए उचित साथ ही उन्हें रोग संबंधी उचित  परामर्श दिया जाता भी दिया गया  है.

मेडिकल ऑफिसर डॉ.अखलूर रहमान ने बताया एड्स एक लाइलाज बीमारी है जो मानवीय प्रतिरक्षी अपूर्णता विषाणु (एचआईवी) संक्रमण के बाद होती है। एचआईवी संक्रमण के पश्चात मानवीय शरीर की प्रतिरोधक क्षमता घटने लगती है। एड्स का पूर्ण रूप से उपचार अभी तक संभव नहीं हो सका है। एचआईवी संक्रमित व्यक्ति में एड्स की पहचान संभावित लक्षणों के दिखने के पश्चात ही हो पाती है। यह बातें सोमवार को हुए स्वास्थ्य शिविर में कहा। उन्होंने कहा शिविर में 84 लोगों की  मुफ्त जांच की व्यवस्था के तहत जांच की गई। यहां गर्भवतियों के में  एचआइवी की भी जांच की गई। 

छुआछूत की बीमारी नहीं एड्स:

प्रखंड स्वास्थ्य प्रबंधक प्रभात रंजन मिश्रा ने बताया एड्स छुआछूत बीमारी नहीं है। इसलिए, पीड़ित व्यक्ति के साथ किसी प्रकार का अनावश्यक भेदभाव नहीं करें। यह हाथ मिलाने, साथ उठने-बैठने, एवं  कपड़े आदान-प्रदान करने से नहीं होता है। बल्कि, असुरक्षित शारीरिक संबंध, एवं  खून के आदान-प्रदान समेत अन्य प्रकार के संपर्क होने से होता है। साथ ही साथ किसी भी व्यक्ति को एड्स का लक्षण दिखे या महसूस हो तो तुरंत उन्हें चिकित्सकों से जाँच कराकर इलाज शुरू करना चाहिए। साथ हीं चिकित्सा परामर्श का पालन करना करना जरूरी है। ताकि परिवार के अन्य लोग इन बीमारियों के दायरे से दूर रह सकें और पीड़ित व्यक्ति का भी समय पर इलाज शुरू हो सके।

संभावित टीबी मरीजों की पहचान के लिए की गई जांच :

केयर इंडिया के प्रखंड प्रबंधक अमित कुमार विपुल ने बताया  शिविर में संभावित यक्ष्मा (टीबी)मरीजों की पहचान के लिए भी जांच की गई।यक्ष्मा रोग एक जटिल रोग है। इसे जल्द से जल्द पहचान कर इलाज शुरु किया जाना चाहिए, ताकि दूसरों व्यक्तियों में यह संक्रमित बीमारी न पहुंचे। वहीं शिविर में एसटीएस को यह भी निर्देश दिया कि यक्ष्मा रोग की पहचान होते ही एसटीएस उसके घर का भ्रमण जरूर करें। गृह भ्रमण के दौरान छह वर्ष तक की उम्र के बच्चों को जेएनएच की गोली देना सुनिश्चित करें। वहीं अगर गृह भ्रमण के दौरान उनके घर के किसी व्यक्ति में भी टीबी के लक्षण पाए जाते हैं तो शीघ्र ही उनके बलगम जांच की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।एमडीआर-टीबी होने पर सामान्य टीबी की कई दवाएं एक साथ प्रतिरोधी हो जाती हैं। टीबी की दवाओं का सही से कोर्स नहीं करने एवं बिना चिकित्सक की सलाह पर टीबी की दवाएं खाने से ही सामान्यता एमडीआर-टीबी होने की संभावना बढ़ जाती है। टीबी के मरीजों को उचित खुराक उपलब्ध कराने के लिए केंद्र सरकार की तरफ से निक्षय पोषण योजना चलायी गयी है। जिसमें टीबी के मरीजों को उचित पोषण के लिए 500 रुपये प्रत्येक महीने दिए जाते हैं। यह राशि उनके खाते में सीधे पहुंचती है। सरकार की मंशा है कि टीबी के मरीजों में 2025 तक 90 प्रतिशत की कमी लायी जा सके।


 


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Posted by : Raushan Pratyek Media

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