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राजू सिंह कि रिपोर्ट दरभंगा से ।

दरभंगा में मिथिला विश्वविद्यालय की स्थापना डॉ अमरनाथ झा , डॉ आर.सी.मुजुमदार जैसे प्रतिष्ठित शिक्षाविदों के सशक्त प्रयासों के कारण संभव हुआ।  डा. मजूमदार, डॉ. ए .एस .अल्तेकर, डॉ. सुनीती कुमार चटर्जी और कई अन्य लोगों ने दरभंगा में एक विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए सरकार से मांग की। 27 जनवरी 1947 को मिथिला विश्वविद्यालय की समिति बनाई गई थी; डॉ अमरनाथ झा इस समिति के अध्यक्ष, पं.  हरिनाथ मिश्र, महासचिव पं. गिरीन्द्र मोहन मिश्र और गंगाधर मिश्र , उपाध्यझ थे। दरभंगा में 14 वं आल इंडिया ओरिएण्टल कॉन्फ्रेंस 15 -18 अक्टूबर 1948   का आयोजन एक बड़ी सफलता थी . ओरिएंटल अध्ययनों के सभी विद्वानों को, विशेष रूप से मिथिला के विद्वानों और पंडितों को एक समान मंच पर लाया, जहां मिथिला - मैथिली की इतिहास, संस्कृति, परंपरा और भाषा पर विचार-विमर्श किया गया। अलग मिथिला विश्वविद्यालय के निर्माण की बैठक भी आयोजित हुई  प्रस्तावित मिथिला विश्वविद्यालय समिति के सदस्यों ने भी 'विश्वविद्यालय दिवस' मनाया। बैठक में कई प्रतिष्ठित विद्वान, डॉ.पी. वी.केन, मुम्बई विश्वविद्यालय के कुलपति, डॉ.आर सी मजूमदार, ढाका विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति ,  डॉ.अमरनाथ झा, बद्रीनाथ वर्मा, शिक्षा मंत्री, बिहार,  बिहार के स्थानीय स्वशासन मंत्री श्री विनोदानंद झा और अन्य उपस्थित थे। वर्ष 1968 में एक मोड़ आया  जब यूजीसी की एक टीम यहां मल्टी फैकल्टी यूनिवर्सिटी की स्थापना की संभावनाओं को जानने के लिए दरभंगा में गई थी। यूजीसी टीम की सिफारिशों के बाद, राज्य सरकार ने दरभंगा में एक आधुनिक विश्वविद्यालय के प्रशासनिक और शैक्षणिक संरचना की जांच के लिए एक समिति गठित की। 1971 में तत्कालीन मुख्य मंत्री कर्पूरी ठाकुर ने मिथिला विश्वविद्यालय के स्थापना हेतु दरभंगा राज से जमीन और भवन देने  हेतु अनुरोध किया । दरभंगा राज ने सहमति व्यक्त की और प्रक्रिया के सम्बन्ध में पत्राचार किया .जून 1971 को कर्पूरी जी की सरकlर चली गयी और 1972 में केदार पांडेय की सरकlर ने मिथिला विश्वविद्यालय की गठन की मंजूरी दी। जिसके लिए ओझा मुकुंद झा , ट्रस्टी दरभंगा राज और महाराज कामेश्वर सिंह के बहिनोई ने दरभंगा स्थित सारlमोहनपुर का अपना महलनुमा भवन और जमीन दिया . फिर 1975 को डिफेन्स ऑफ़ इंडिया एक्ट के तहत दरभंगा राज का मुख्यालय ले लिया गया जिसके विरुद्ध वाद न्यायलय पहुंचा और फिर समझौता के तहत करीब 200 एकड़ जमीन , महल-भवन और पुस्तकालय जिसमे करीब 72000 दुर्लभ पुस्तक थी दरभंगा राज द्वारा मिथिला विश्वविद्यालय को दिया गया। मिथिला विश्वविद्यालय जिसका नामांकरण बाद में ललित नारायण मिश्र के नाम पर 1975 में रखा गया जिसे 1977 में  जनता पार्टी के सरकlर में फिर मिथिला विश्वविद्यालय कर दिया गया पुनः 1980 में  मिथिला विश्वविद्यालय में ललित नारायण जोड़ा गया ।।


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